Dev Uthani Ekadashi Kab Hai?

Dev Uthani Ekadashi Kab Hai? Is Din Se Shuru Honge Manglik Karya; Janen Sahi Date Aur Tithi

देव उठनी एकादशी कब है? इस दिन से शुरू होंगे मांगलिक कार्य

चार महीने। पूरे चार महीने भगवान विष्णु सोते रहे। न शादियाँ हुईं, न मुंडन, न गृह प्रवेश। हर मांगलिक काम रुका रहा। और अब हर भक्त के मन में एक ही सवाल है — Dev Uthani Ekadashi Kab Hai? जवाब है 4 दिसंबर 2026 — वह पल जब पूरा भारत एक साथ साँस छोड़ेगा। Dev Uthani Ekadashi आ रही है।

यह सिर्फ एक तिथि नहीं है। यह उस ताले की चाबी है जो चार महीनों से बंद था। जिस घर में शादी तय है, जिस माँ ने बेटे का मुंडन रोक रखा है, जिस परिवार ने गृह प्रवेश की date नहीं दी — सब इसी दिन का इंतजार कर रहे थे।

तो आइए जानते हैं — देव उठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi Kab Hai?) कब है, इसकी सही तिथि क्या है, शुभ मुहूर्त कौन सा है, और इस दिन से कौन-कौन से मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।

देव उठनी एकादशी Dev Uthani Ekadashi 2026 — सही Date और तिथि

देव उठनी एकादशी: शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026

विवरणजानकारी
एकादशी नामदेव उठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi) / प्रबोधिनी एकादशी / उत्थान एकादशी
तिथिएकादशी — मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष
दिनशुक्रवार
वर्ष2026
चातुर्मास समाप्तिइसी दिन
तुलसी विवाहइसी दिन

एकादशी तिथि का सटीक प्रारंभ और समापन समय आपके स्थान के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। अपने शहर के अनुसार स्थानीय पंचांग या ISKCON कैलेंडर ज़रूर देखें।

देव उठनी एकादशी है (Dev Uthani Ekadashi) क्या? — बिल्कुल Simple भाषा में

बहुत से लोग जानते हैं कि इस दिन से शादियाँ शुरू होती हैं — पर यह क्यों  होता है, यह कम लोग जानते हैं।

बात शुरू होती है शयन एकादशी से — जो 2026 में 25 जुलाई को थी। उस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले गए। यानी ब्रह्मांड के पालनहार सो गए। और जब पालनहार सोए हों, तो नए शुभ कार्य कैसे शुरू हों?

यही वैदिक तर्क है।

चार महीने — श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक — चातुर्मास कहलाते हैं। इन चार महीनों में:

  • विवाह वर्जित
  • मुंडन वर्जित
  • गृह प्रवेश वर्जित
  • जनेऊ संस्कार वर्जित
  • कोई भी बड़ा मांगलिक कार्य वर्जित

और फिर आती है देवउठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi) — मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी Ekadashi — जिस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। चातुर्मास समाप्त होता है। और पूरे देश में एक साथ मांगलिक कार्यों का द्वार खुल जाता है।

चार महीने रुकने की Science भी है, सिर्फ Religion नहीं

यह सोचना गलत होगा कि चातुर्मास सिर्फ धार्मिक मान्यता है। इसके पीछे व्यावहारिक तर्क भी है।

श्रावण से कार्तिक तक — यानी जुलाई से नवंबर — भारत में मानसून का मौसम होता है। बारिश, बाढ़, कीचड़। यात्रा कठिन। नदियाँ उफान पर। खेत-खलिहान व्यस्त।

प्राचीन भारत में जब परिवहन के साधन नहीं थे, तब शादी-ब्याह के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। मानसून में यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। तो धर्म और व्यावहारिकता — दोनों ने मिलकर यह नियम बनाया।

अब मानसून जा चुका है। ठंड का मौसम शुरू हो रहा है। फसल कट चुकी है। घर में अनाज है। परिवार के पास समय और पैसा दोनों हैं। देवउठनी एकादशी से शादियों का मौसम शुरू होना— यह perfect timing है।

देव उठनी एकादशी के अन्य नाम — और हर नाम की अपनी कहानी

इस एकादशी को अलग-अलग जगह अलग नामों से जाना जाता है। हर नाम एक अलग पहलू बताता है।

प्रबोधिनी एकादशी — प्रबोधिनी यानी “जगाने वाली।” यह नाम सबसे सटीक है। जो सोए हुए थे, वह जाग गए।

उत्थान एकादशी — उत्थान यानी “उठना।” भगवान का उठना। साथ में पूरे देश के मांगलिक कार्यों का उठना।

देवोत्थान एकादशी — देव+ उत्थान — देवों का उठना। कुछ शास्त्रों में यही नाम प्रचलित है।

हरि प्रबोधिनी — भगवान हरि (विष्णु) का जागरण।

तुलसी विवाह एकादशी — क्योंकि इसी दिन तुलसी विवाह होता है — और यह देव उठनी एकादशी का सबसे रंगीन, सबसे भावपूर्ण पहलू है।

तुलसी विवाह — देव उठनी एकादशी का सबसे Special रस्म

अगर देव उठनी एकादशी एक उत्सव है, तो तुलसी विवाह उस उत्सव का केंद्र है।

इस दिन तुलसीमाता का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से कराया जाता है। घरों में और मंदिरों में पूरी शादी की रस्में होती हैं — मंडप, फेरे, सिंदूर, मंगलसूत्र — सब कुछ।

तुलसी विवाह की विधि

  • तुलसी के पौधे को लाल चुनरी ओढ़ाएं
  • शालिग्राम (या विष्णु की मूर्ति) को पास रखें
  • गन्ने का मंडप बनाएं — यह शुभ माना जाता है
  • पीले फूल, आंवला, बेर अर्पित करें
  • दीपक जलाएं और विष्णु सहस्रनाम या हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें
  • सात फेरे करें तुलसी और शालिग्राम के बीच
  • अंत में आरती करें और प्रसाद बाँटें

माना जाता है कि जो घर में तुलसी विवाह कराता है, उसे कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है। और जिस घर में तुलसी विवाह होता है, वहाँ भगवान विष्णु और लक्ष्मी की कृपा स्थायी रूप से बनी रहती है।

देव उठनी एकादशी की पौराणिक कथा — वह कहानी जो सब कुछ explain करती है

Dev Uthani Ekadashi Kab Hai? Infographic

पद्म पुराण और स्कंद पुराण में देव उठनी एकादशी की कथा विस्तार से दी गई है।

एक समय की बात है। शंखासुर नाम का एक दैत्य था — महाबलशाली, निर्भय, और देवताओं के लिए भीषण संकट। उसने तीनों लोकों में कहर मचाया। देवता परेशान हो गए। ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के पास भेजा।

भगवान विष्णु ने शंखासुर से युद्ध किया। लंबा, भीषण युद्ध। अंत में शंखासुर मारा गया — पर इस युद्ध में भगवान विष्णु इतने थक गए कि वह योगनिद्रा में चले गए।

देवताओं ने स्तुति की। लक्ष्मी जी ने सेवा की। चार महीने बाद, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को — भगवान विष्णु जागे।

उनके जागने का यही दिन है — देव उठनी एकादशी।

एक और कथा में भगवान वामन का उल्लेख है — जिन्होंने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी और पूरा ब्रह्मांड नाप दिया। राजा बलि ने विष्णु से अनुरोध किया कि वह उनके राज्य में रहें। भगवान ने मान लिया — पर इसकी शर्त यह थी कि वह चार महीने राजा बलि के राज्य (पाताल लोक) में रहेंगे। देव उठनी एकादशी वह दिन है जब वह वापस लौटते हैं।

दोनों कथाएं एक ही सत्य को अलग-अलग तरीके से बताती हैं — भगवान का वापस आना, जागना, और सक्रिय होना।

Ekadashi Kab Hai — देव उठनी एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त

4 दिसंबर 2026 को देव उठनी एकादशी है — लेकिन सिर्फ तारीख जानना काफी नहीं। शुभ मुहूर्त जानना ज़रूरी है — खासकर उनके लिए जो इस दिन से मांगलिक कार्य शुरू करना चाहते हैं।

पूजा के लिए शुभ समय

ब्रह्म मुहूर्त — सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटे पहले। यह दिन का सबसे आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली समय है। इस समय की गई विष्णु पूजा का फल बाकी पूरे दिन से कई गुना अधिक माना जाता है।

अभिजित मुहूर्त — दोपहर के सूर्य के आसपास लगभग 48 मिनट। तुलसी विवाह और विष्णु पूजा के लिए दोपहर का यह समय बेहद शुभ है।

प्रदोष काल — सूर्यास्त के बाद का समय। इस समय देव जागरण की विशेष पूजा की जाती है। मंदिरों में शंख बजाए जाते हैं, दीपमाला जलाई जाती है, और भगवान विष्णु को जगाने के मंत्र पढ़े जाते हैं।

तुलसी विवाह का सबसे शुभ समय

तुलसी विवाह के लिए प्रदोष काल — यानी सूर्यास्त के बाद का समय — सबसे उपयुक्त माना जाता है। शाम के दीपक की रोशनी में, ठंड की हवा में, शंख और मंगलगान के साथ तुलसी विवाह का दृश्य — यह अनुभव शब्दों में नहीं आता।

देव उठनी एकादशी से शुरू होने वाले मांगलिक कार्य

यही वह सवाल है जो सबसे ज़्यादा पूछा जाता है। तो एक-एक करके बताते हैं।

1. विवाह (शादी)

यह सबसे बड़ा कारण है जिसके लिए लोग देव उठनी एकादशी का इंतजार करते हैं। चातुर्मास में सभी विवाह वर्जित थे — 4 दिसंबर 2026 से विवाह मुहूर्त खुल जाते हैं।

दिसंबर 2026 से मार्च 2027 तक — विवाह का peak season होगा। जिन परिवारों ने शादी की date रोककर रखी है, वे अब पंचांग लेकर बैठेंगे।

2. सगाई और रोका

सगाई और रोका की रस्म के लिए भी चातुर्मास में प्रतिबंध होता है। देव उठनी एकादशी के बाद यह भी शुरू हो जाती हैं।

3. मुंडन संस्कार

बच्चे का पहला मुंडन — यह हिंदू संस्कारों में एक महत्वपूर्ण रस्म है। चातुर्मास में रुकी हुई सभी मुंडन तारीखें अब तय होंगी।

4. जनेऊ संस्कार (उपनयन)

यज्ञोपवीत संस्कार — ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य परिवारों में यह महत्वपूर्ण संस्कार है। चातुर्मास में वर्जित। 4 दिसंबर के बाद शुरू।

5. गृह प्रवेश

नए घर में प्रवेश के लिए भी देव उठनी एकादशी का इंतजार होता है। जिन परिवारों का घर बन चुका है पर गृह प्रवेश रुका था — उनके लिए यह दिन बड़ी खुशखबरी है।

6. नया व्यापार शुरू करना

कोई नई दुकान खोलनी हो, नया business शुरू करना हो — देव उठनी एकादशी के बाद का समय इसके लिए भी शुभ माना जाता है।

7. नामकरण संस्कार

बच्चे के नामकरण की रस्म भी इसी समय से शुरू होती है। हालाँकि कुछ परंपराओं में नामकरण के लिए इतनी सख्त पाबंदी नहीं होती, पर बड़े परिवारों में देव उठनी के बाद ही यह रस्म होती है।

देव उठनी एकादशी का व्रत — कैसे करें सही तरीके से

देव उठनी एकादशी सिर्फ मांगलिक कार्यों की शुरुआत नहीं है — यह एक पवित्र व्रत भी है। और इस व्रत का पुण्य असाधारण है।

एक रात पहले (दशमी — 3 दिसंबर 2026)

  • हल्का सात्विक भोजन करें — मांस, प्याज, लहसुन बिल्कुल नहीं
  • सूर्यास्त से पहले भोजन कर लें
  • रात को जल्दी सोएं — ब्रह्म मुहूर्त में उठना है

एकादशी के दिन (4 दिसंबर 2026)

सुबह:

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें
  • स्नान करें
  • पीले वस्त्र पहनें — भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है
  • भगवान विष्णु की पूजा करें — तुलसी दल, पीले फूल, धूप, दीप
  • हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें

दिन भर:

  • अन्न और दाल बिल्कुल नहीं — चावल, गेहूं, दाल, रोटी सब वर्जित
  • फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, सेंधा नमक — यह सब ठीक है
  • दिन में सोना मना है
  • शास्त्र पढ़ें, भजन-कीर्तन करें

शाम को:

  • तुलसी विवाह की रस्म करें
  • देव जागरण की पूजा करें — शंख बजाएं, दीपमाला जलाएं
  • “उत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते“ — यह मंत्र पढ़कर भगवान को जगाएं
  • रात को जागकर भजन करें

व्रत तोड़ना(पारण— 5 दिसंबर 2026)

  • द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें
  • हरि वासर में व्रत न तोड़ें
  • पहले तुलसी दल और जल से शुरू करें
  • फिर फल, फिर पूरा भोजन

देव जागरण — भगवान को जगाने का वह खास क्षण

देव उठनी एकादशी की रात का सबसे special moment है — देव जागरण।

शाम को, जब अंधेरा होने लगता है — मंदिरों में और घरों में एक अलग ही माहौल बन जाता है। दीपमाला जलाई जाती है। शंख बजाया जाता है। घंटे-घड़ियाल की आवाज़ गूँजती है।

भगवान को जगाने के लिए यह मंत्र पढ़ा जाता है:

“उत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्॥ उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलं जगत्॥“

अर्थ: “हे गोविंद, उठिए, निद्रा त्यागिए। हे जगन्नाथ, जब आप सोते हैं तो पूरा जगत सो जाता है। जब आप उठते हैं तो सब चलने लगता है। उठिए, हे माधव। बादल जा चुके हैं, संसार निर्मल हो गया है।”

यह मंत्र पढ़ते समय जो भाव आता है — वह शब्दों में बताना मुश्किल है। चार महीनों की प्रतीक्षा के बाद अपने प्रभु को जगाने का वह क्षण — यही देव उठनी एकादशी का असली सार है।

ISKCON मायापुर में देव उठनी एकादशी — एक अलग अनुभव

ISKCON Mayapur — जो विश्व का वैष्णव तीर्थ है — में देव उठनी एकादशी का उत्सव देखने लायक होता है।

यहाँ चातुर्मास के चार महीनों में विशेष कार्यक्रम चलते हैं। और देव उठनी एकादशी पर — जब भगवान जागते हैं — पूरा मायापुर एक अलग ही ऊर्जा से भर जाता है।

  • विशाल देव जागरण कार्यक्रम
  • तुलसी विवाह की भव्य रस्म
  • रात भर हरे कृष्ण महामंत्र का संकीर्तन
  • प्रसाद वितरण

अगर जीवन में एक बार देव उठनी एकादशी मायापुर में मनाने का मौका मिले — ज़रूर जाइए।

देव उठनी एकादशी के बाद विवाह के शुभ मुहूर्त 2026-27

4 दिसंबर 2026 के बाद से विवाह मुहूर्त खुल जाएंगे। दिसंबर 2026 से मार्च 2027 तक कई शुभ तारीखें मिलेंगी। सटीक मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंडित जी से या वैष्णव पंचांग से जाँच करें।

कुछ सामान्य बातें जो हर किसी को पता होनी चाहिए:

  • मार्गशीर्ष महीना (दिसंबर) — विवाह के लिए अत्यंत शुभ। भगवान कृष्ण ने खुद गीता में कहा: “महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ।”
  • गुरुवार और शुक्रवार — विवाह के लिए सर्वाधिक शुभ वार
  • पूर्णिमा के आसपास के दिन — चंद्रमा की ऊर्जा विवाह में सहायक होती है
  • अमावस्या, एकादशी, द्वादशी — इन तिथियों पर विवाह वर्जित माना जाता है

FAQ Dev Uthani Ekadashi Kab Hai?

Q: देव उठनी एकादशी 2026 में कब है? A: शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को।

Q: क्या देवउठनी एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी एक ही है? A: हाँ, बिल्कुल। देव उठनी, प्रबोधिनी, उत्थान, देवोत्थान — ये सब एक ही एकादशी के अलग-अलग नाम हैं।

Q: तुलसी विवाह कब होता है? A: देव उठनी एकादशी के दिन — यानी 4 दिसंबर2026 को। शाम के प्रदोष काल में।

Q: क्या देवउठनी एकादशी के दिन शादी हो सकती है? A: इस दिन से मुहूर्त खुलते हैं, पर एकादशी तिथि पर विवाह नहीं होता। द्वादशी से आगे के मुहूर्त देखें।

Q: चातुर्मास में क्या-क्या वर्जित है? A: विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश, और कोई भी बड़ा मांगलिक कार्य। साथ ही कुछ परंपराओं में बैंगन, दही, पत्तेदार सब्जियाँ आदि का भी त्याग होता है।

Q: देवउठनी एकादशी पर क्या खाएं? A: फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, आलू, मेवे, सेंधा नमक। अनाज और दाल बिल्कुल नहीं।

देव उठनी एकादशी — सिर्फ एक तारीख नहीं, एक अनुभव है

जानते हैं इस एकादशी की सबसे खास बात क्या है?

यह अकेली नहीं आती।

साथ लाती है — तुलसी विवाह का उत्सव, मंदिरों में दीपमाला, शंख की गूँज, चार महीनों की रुकी हुई शादियों का उत्साह, माँओं की राहत की साँस, और उस हर इंसान की खुशी जिसने किसी शुभ काम के लिए यह दिन का इंतजार किया था।

4 दिसंबर 2026 को जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागेंगे — पूरा भारत एक साथ जागेगा। मांगलिक कार्यों का ताला खुलेगा। और जीवन फिर से अपनी पूरी गति से चलने लगेगा।

यही देव उठनी एकादशी है। यही इसका जादू है।

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